डर के आगे मनोरंजन भी है
स्टेट ड्राईव बाय सपन दुबे
हॉरर फिल्मों के दिग्गज निर्देशकों में गिने जाने वाले श्याम रामसे का मुबंई के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उन्होने दरवाजा, पुराना मंदिर, तहखाना जैसी अनेक हॉरर फिल्में बनाई थी। उनका दावा था कि उनकी भूत से मुलाकात हुई थी शायद यह मार्केटिंग फंडा था जिसमें वे लोगो का विश्वास भूतों पर करवाना चाहते थे। इसी तरह श्याम ने अपनी फिल्म दो गज जमीन के नीचे टॉकीज में अकेले देखने वाले को एक हजार रूपए देने की घोषणा की थी इसके पीछे भी उनकी व्यवसायिक सोच रही होगी। श्याम रामसे हमेशा डर को ‘केश’ कराते रहे और दरवाजे की चरमराहट और लालटेन लिए हुए सफेद साड़ी में औरत उनका प्रिय शॉट था जो लगभग हर फिल्म में मौजूद था। जिस दौर में 50 लाख रूपए में फिल्में बनती थी वहीं रामसे मात्र 3-4 लाख रूपए में फिल्म बना देते थे। उन्होने डर के साथ सैक्स का भी मिश्रण कर परोसा। डर जीवन का अहम पहलू है जिस रामसे ने बखूबी समझा। डर वैसे अक्सर आधारहीन ही होता है जिस डिसआर्डर को मनोचिकित्सक फोबिया या फीयर काम्प्लेक्स कहते हैं। डर सभी को कुछ ना कुछ चीज से जरूर लगता है। पाकिस्तान के वजीरेआला इमरान खान को छिपकली से, गायक कुमार शानु को अकेले सोने से, किसी को लिफ्ट, ऊंचाई से,और अधिकत्तर महिलाओं को काक्रोच से। मनोचिकित्सक का कथन है कि जिस चीज से डर लगे वह जरूर करो। ज्यादातर खौफ फिजूल होते हैं अध्यात्म से जुडक़र ही व्यक्ति यह समझ पाता है। असुरक्षा की भावना वर्तमान में सबसे प्रबल खौफ है जिससे घनाड्य वर्ग खासकर नवधनाड्य वर्ग ग्रस्ति है। यह हास्यापद है कि लोग भूतों से डरते हैं परन्तु किसी भी देश या प्रकृति का नुकसान कभी भूतों ने नहीं किया, इंसानों ने जरूर किया है क्योंकि मनूष्य जैसा भयावह प्राणी दूसरा और कोई नहीं है। खबर है कि रामसे अपनी ही फि
ल्म वीराना का सिक्वल बनाना चाहते थे। वैसे पुराणों में भूतों का उल्लेख भी है जिसके प्रमाण हनुमान चालीसा में भी मिलता है कि महावीर के नाम सुनते ही भूत पिशाच निकट नहीं आते हैं। रामसे के पास डर को मनोरंजन का माध्यम बनाने की अद्भुत कला थी। रामसे का नाम कभी शौमैन सुभाष घई और राजकुमार हिरानी जैसे शीर्ष निर्देशको ंके साथ नहीं लिया जाएगा पर रामसे एक क्षेत्र विशेष के मुक्कमल किरदार थे गोया की इन्होने डराने की मानद उपाधी प्राप्त कर ली थी। अलविदा रामसे....
स्टेट ड्राईव बाय सपन दुबे
हॉरर फिल्मों के दिग्गज निर्देशकों में गिने जाने वाले श्याम रामसे का मुबंई के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उन्होने दरवाजा, पुराना मंदिर, तहखाना जैसी अनेक हॉरर फिल्में बनाई थी। उनका दावा था कि उनकी भूत से मुलाकात हुई थी शायद यह मार्केटिंग फंडा था जिसमें वे लोगो का विश्वास भूतों पर करवाना चाहते थे। इसी तरह श्याम ने अपनी फिल्म दो गज जमीन के नीचे टॉकीज में अकेले देखने वाले को एक हजार रूपए देने की घोषणा की थी इसके पीछे भी उनकी व्यवसायिक सोच रही होगी। श्याम रामसे हमेशा डर को ‘केश’ कराते रहे और दरवाजे की चरमराहट और लालटेन लिए हुए सफेद साड़ी में औरत उनका प्रिय शॉट था जो लगभग हर फिल्म में मौजूद था। जिस दौर में 50 लाख रूपए में फिल्में बनती थी वहीं रामसे मात्र 3-4 लाख रूपए में फिल्म बना देते थे। उन्होने डर के साथ सैक्स का भी मिश्रण कर परोसा। डर जीवन का अहम पहलू है जिस रामसे ने बखूबी समझा। डर वैसे अक्सर आधारहीन ही होता है जिस डिसआर्डर को मनोचिकित्सक फोबिया या फीयर काम्प्लेक्स कहते हैं। डर सभी को कुछ ना कुछ चीज से जरूर लगता है। पाकिस्तान के वजीरेआला इमरान खान को छिपकली से, गायक कुमार शानु को अकेले सोने से, किसी को लिफ्ट, ऊंचाई से,और अधिकत्तर महिलाओं को काक्रोच से। मनोचिकित्सक का कथन है कि जिस चीज से डर लगे वह जरूर करो। ज्यादातर खौफ फिजूल होते हैं अध्यात्म से जुडक़र ही व्यक्ति यह समझ पाता है। असुरक्षा की भावना वर्तमान में सबसे प्रबल खौफ है जिससे घनाड्य वर्ग खासकर नवधनाड्य वर्ग ग्रस्ति है। यह हास्यापद है कि लोग भूतों से डरते हैं परन्तु किसी भी देश या प्रकृति का नुकसान कभी भूतों ने नहीं किया, इंसानों ने जरूर किया है क्योंकि मनूष्य जैसा भयावह प्राणी दूसरा और कोई नहीं है। खबर है कि रामसे अपनी ही फि
ल्म वीराना का सिक्वल बनाना चाहते थे। वैसे पुराणों में भूतों का उल्लेख भी है जिसके प्रमाण हनुमान चालीसा में भी मिलता है कि महावीर के नाम सुनते ही भूत पिशाच निकट नहीं आते हैं। रामसे के पास डर को मनोरंजन का माध्यम बनाने की अद्भुत कला थी। रामसे का नाम कभी शौमैन सुभाष घई और राजकुमार हिरानी जैसे शीर्ष निर्देशको ंके साथ नहीं लिया जाएगा पर रामसे एक क्षेत्र विशेष के मुक्कमल किरदार थे गोया की इन्होने डराने की मानद उपाधी प्राप्त कर ली थी। अलविदा रामसे....


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