रामायण की उपेक्षित पात्र, उर्मीला
स्टे्रट ड्राईव बास सपन दुबे
रामायण में कुछ पात्रों बेहद महत्वपूर्ण होकर उपेक्षित, अनदेखे पात्र थे जो गौण रह गए। इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण लक्ष्मण की पत्नी उर्मीला थी। उर्मीला की व्यथा को सबसे बेहतर तरीके से मैथिलीशरण गुप्त ने महाकाव्य साकेत के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। यह कविता रामकथा पर आधारित है, यद्यपि साकेत में राम, लक्ष्मण और सीता के वन गमन का मार्मिक चित्रण है, किन्तु महाकाव्य का केन्द्र उर्मिला है। लगभग सभी लेखकों द्वारा रामायण में, इनका सिर्फ सांकेतिक वर्णन ही किया गया है। लेकिन इस रचना में उर्मिला के विरह का जो चित्रण श्री गुप्त ने प्रस्तुत किया है, वह अत्यधिक मार्मिक और गहरी मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत है। राम के साथ सीता तो वन चली जाती हैं, परन्तु उर्मिला पति लक्ष्मण की शपथ के कारण उनके साथ वन नहीं जा पाती है। तभी वह अपने मन-मंदिर में अपने पति की प्रतिमा स्थापित करके उर्मिला विरह की अग्नि में जलते हुए खुद आरती की ज्योति बन गईं। आंखों में अपने प्रिय की मूर्ति बसाकर सभी मोह-माया को त्याग कर उर्मीला का जीवन एक योगी के जीवन से भी ज्यादा कठिन और कष्टदायक हो जाता है। दिन-रात स्वामी के ध्यान में डूबने के कारण वे स्वयं को भी भूल गईं। इस कारण उनके मन में विरह की जो पीड़ा निरंतर प्रवाहित होती है, उसका एक करुण चित्रण कवि ने किया है, वैसा चित्रण अत्यंत दुर्लभ है- ‘प्राण न पागल हो तुम यों, पृथ्वी पर वह प्रेम कहां, मोहमयी छलना भर है, भटको न अहो अब और यहां, ऊपर को निरखो अब तो बस मिलता है चिरमेल वहां, स्वर्ग वहीं, अपवर्ग वहीं, सुखसर्ग वहीं, निजवर्ग जहां’। श्री गुप्त को उर्मिला के प्रति सहानुभूति है, परन्तु यह सहानुभूति किसी नारीवादी आन्दोलन के कारण नहीं बल्कि एक वैष्णव कवि की सहज और स्वाभाविक अनुभूति का परिणाम है। रामायण में उल्लेख है कि लक्ष्मण की विजय का मुख्य कारण उर्मिला थी। मेघनाद के वध के बाद उनका शव श्री राम के खेमे में था जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना उसे लेने आई, पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया, उसकी आंखें बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि मेघनाद का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था, जिसमें उर्मीला विजय हुई। उर्मीला त्याग की असीम सीमा थी, राम को अपने पिता की आज्ञा का पालन करना था, सीता अपने पति के साथ थी सबसे अधिक करूण स्थिति उर्मीला की थी जिसका कोई दोष नहीं था फिर भी नवविवाहिता होकर भी राजमहल में अपने पति के बिना एक-एक दिन सदियों की तरह गुजारे। उर्मीला को स्वप्न भी नहीं आता और रात्रि व्यतीत हो जाती है, रात्रि तो वह किसी प्रकार तारे गिन-गिन कर व्यतीत करती है परन्तु दिन किस प्रकार व्यतीर करे इस पर श्री गुप्त ने मार्मिक चित्रण किया है कि हाय न आया स्वप्न भी, और गई वह रात। सखी उडगन भी उड़ चले, अब क्या गिनूं प्रभात। कहने में अतिशोक्ति नहीं होगी की रामायण की रचना में उर्मीला भले ही एक अदृश्य पात्र की तरह हों पर उनके बिना यह ग्रंथ कभी संपूर्ण हो नहीं हो सकता था। उर्मीला की तरह राजा भरत भी थे उनका चित्रण अगले अंक में।

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