अभिनय की ऊंचाईयों को इरफान ने पुन: परिभाषित किया
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
बैतूल। इरफान खान बहुत ही कम उम्र में इस दुनिया से रूखसत हो गए वे कैंसर से पीडि़त थे। चिकित्सा विज्ञान ने तथाकथित रूप से बहुत प्रगति की है लेकिन कैंसर, एडस जैसी कई बीमारियां आज भी लाईलाज हैं। यह बताने के लिए काफी है कि नीचे का निजाम आज भी उपर वाला ही चलाता है। इरफान खान के निधन पर आज फिर एक बार टीस उभर कर सामने आई की सन् 2012 में रिलीज उनकी फिल्म पान सिंह तोमर को ऑस्कर के लिए भारत से क्यों नहीं भेजा गया था। इरफान की भद्रता थी की उन्होने इस संबंध में कभी कोई बयान नहीं दिया परन्तु पान सिंह तोमर को ऑस्कर के लिए नहीं भेजना भारतीय ज्युरी की रचनात्मक क्षमता पर एतिहासिक प्रश्न चिन्ह हमेशा लगाती रहेगी। बहुत कम कलाकार ऐसे होते हैं जो नृत्य, सुंदर चेहरे, सुडौल शरीर, एक्शन, नेपोटिज़म के बिना शीर्ष मुकाम हासिल कर सकें इरफान उन्ही में से एक थे। इरफान ने हमेशा आंखों से अभिनय किया उन्हें शर्ट उतारने जैसे फूहड़ तरीकों की जरूरत कभी नहीं पड़ी। जयपुर में जन्में क्रिकेट के शौकीन इरफान ने आर्थिक अभाव के कारण क्रिकेट को त्याग दिया था बताते हैं कि वे हर वर्ष संक्रंात पर पतंग उड़ाने जयपुर जरूर जाते थे। जमीन से जुड़े इस कलाकार की यही स्ट्रेंथ उनकी अदाकारी में थी। इरफान ने अभिनय की ऊंचाईयों को पुन:परिभाषित किया और स्वयं के प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग खड़ा कर लिया। यही वजह है कि बॉलीबुड में अलग-अलग शेड और ज़ोनर के निर्देशक उन्हें हर किरदार में मुक्कमल मानते थे। इरफान की सबसे बड़ी यूएसपी उनकी संवाद अदायगी थी जिसके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। उनके संवाद जिनमें बीहड़ में तो बागी होते हैं डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में, गलतियां भी रिश्तों की तरह होती है, करनी नहीं पड़ती हो जाती है और रिश्तों में भरोसा और मोबाईल में नेटवर्क नहीं होतो लोग गेम खेलने लगते हैं आदि बहुत मशहूर हुए। उनकी संवाद अदायगी नवोदित कलाकारों के लिए विश्वविद्यालय के तौर पर हमेशा सुरक्षित रहेगी। इरफान खान अपनी बात हमेशा साफगोई से रखते थे एक बार अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन के दौरान उन्होने कहा कि दो बकरे खरीद कर उनका वध कर देना कुर्बानी नहीं है? कुर्बानी का अर्थ है कि हम कोई अपनी प्रिय वस्तु किसी को दें। जिस पर मुस्लिम स्कॉलरों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी परन्तु वे टस से मस नहीं हुए। इरफान की मां को भी शायद उनकी मौत का आभास था, इसलिए बेटे की मौत से चंद दिन पहले ही उन्होने दुनिया को अलविदा कह दिया था, अब इन दोनो का मिलन जन्नत में ही जरूर होगा। फिल्म पीकू में इरफान का एक हास्य संवाद था डेथ और शिट किसी को, कहीं भी, कभी भी आ सकती है। यह हास्य आज यथार्थ के दर्शन करवा रहा है परन्तु उनकी मौत का ऐसे असमय आना बहुत नागवार गुजरा। इरफान के पास अभी बहुत कुछ देने को था जिससे वो कला जगत को मरहूम कर गए।
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
बैतूल। इरफान खान बहुत ही कम उम्र में इस दुनिया से रूखसत हो गए वे कैंसर से पीडि़त थे। चिकित्सा विज्ञान ने तथाकथित रूप से बहुत प्रगति की है लेकिन कैंसर, एडस जैसी कई बीमारियां आज भी लाईलाज हैं। यह बताने के लिए काफी है कि नीचे का निजाम आज भी उपर वाला ही चलाता है। इरफान खान के निधन पर आज फिर एक बार टीस उभर कर सामने आई की सन् 2012 में रिलीज उनकी फिल्म पान सिंह तोमर को ऑस्कर के लिए भारत से क्यों नहीं भेजा गया था। इरफान की भद्रता थी की उन्होने इस संबंध में कभी कोई बयान नहीं दिया परन्तु पान सिंह तोमर को ऑस्कर के लिए नहीं भेजना भारतीय ज्युरी की रचनात्मक क्षमता पर एतिहासिक प्रश्न चिन्ह हमेशा लगाती रहेगी। बहुत कम कलाकार ऐसे होते हैं जो नृत्य, सुंदर चेहरे, सुडौल शरीर, एक्शन, नेपोटिज़म के बिना शीर्ष मुकाम हासिल कर सकें इरफान उन्ही में से एक थे। इरफान ने हमेशा आंखों से अभिनय किया उन्हें शर्ट उतारने जैसे फूहड़ तरीकों की जरूरत कभी नहीं पड़ी। जयपुर में जन्में क्रिकेट के शौकीन इरफान ने आर्थिक अभाव के कारण क्रिकेट को त्याग दिया था बताते हैं कि वे हर वर्ष संक्रंात पर पतंग उड़ाने जयपुर जरूर जाते थे। जमीन से जुड़े इस कलाकार की यही स्ट्रेंथ उनकी अदाकारी में थी। इरफान ने अभिनय की ऊंचाईयों को पुन:परिभाषित किया और स्वयं के प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग खड़ा कर लिया। यही वजह है कि बॉलीबुड में अलग-अलग शेड और ज़ोनर के निर्देशक उन्हें हर किरदार में मुक्कमल मानते थे। इरफान की सबसे बड़ी यूएसपी उनकी संवाद अदायगी थी जिसके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। उनके संवाद जिनमें बीहड़ में तो बागी होते हैं डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में, गलतियां भी रिश्तों की तरह होती है, करनी नहीं पड़ती हो जाती है और रिश्तों में भरोसा और मोबाईल में नेटवर्क नहीं होतो लोग गेम खेलने लगते हैं आदि बहुत मशहूर हुए। उनकी संवाद अदायगी नवोदित कलाकारों के लिए विश्वविद्यालय के तौर पर हमेशा सुरक्षित रहेगी। इरफान खान अपनी बात हमेशा साफगोई से रखते थे एक बार अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन के दौरान उन्होने कहा कि दो बकरे खरीद कर उनका वध कर देना कुर्बानी नहीं है? कुर्बानी का अर्थ है कि हम कोई अपनी प्रिय वस्तु किसी को दें। जिस पर मुस्लिम स्कॉलरों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी परन्तु वे टस से मस नहीं हुए। इरफान की मां को भी शायद उनकी मौत का आभास था, इसलिए बेटे की मौत से चंद दिन पहले ही उन्होने दुनिया को अलविदा कह दिया था, अब इन दोनो का मिलन जन्नत में ही जरूर होगा। फिल्म पीकू में इरफान का एक हास्य संवाद था डेथ और शिट किसी को, कहीं भी, कभी भी आ सकती है। यह हास्य आज यथार्थ के दर्शन करवा रहा है परन्तु उनकी मौत का ऐसे असमय आना बहुत नागवार गुजरा। इरफान के पास अभी बहुत कुछ देने को था जिससे वो कला जगत को मरहूम कर गए। 
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