एक दिवाना था .........
स्टे्रट ड्राईव बाय सपन दुबे


चौबीस घंटे के भीतर सीनेप्रेमियों को बड़ा झटका लगा, जब समाचार आया की ऋषि कपूर नहीं रहे। इत्तफाक ही है कि ऋषि कपूर के निधन का कारण भी इरफान खान की तरह कैंसर ही बना। ऋषि कपूर का फिल्मी जीवन दो भागों में विभाजित था जिसके पहले भाग में वो लवर बॉय की तरह ही काम करते रहे या यों कहें की वो इसी में टाईप्ड हो गए थे, रोमेंटिक इमेज होना ही उनका बल था और उनकी कमजोरी भी। उनके रोमेंटिक दौर का अंदाजा फकत इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होने दिव्या भारती जैसी अपने से बेहद कम उम्र की नायिका के साथ भी काम किया और दर्शकों ने उसको स्वीकार किया। अधिकत्तर लोग उस समय उनको लवर बॉय के रूप में ही देखते रहे परन्तु ऋषि कपूर का कॉमिक सेंस भी अव्वल दर्जे का था जिसे ज्यादा नोटिस नहीं किया गया। अमर अकबर एंथोनी, कुली, नसीब जैसी फिल्में उनके कॉमिक सेंस का बेहतरीन उदाहरण रहीं है। जयप्रकाश चौकसे ने एक बार लिखा था कि ऋषि कपूर एकमात्र सितारा है, जो राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जीतेन्द्र और धर्मेन्द्र के दौर में सबसे अधिक सफल नायक रहे। ऋ षि अपनी लंबी यात्रा में कहां-कहां से गुजरें है और वह मिट्टी पकड़ पहलवान है जो गिर सकता है परन्तु पराजित नहीं होता। यह कितने आश्चर्य की बात है कि 43 वर्षों से लगातार सक्रिय कलाकार को केन्द्र सरकार ने कभी पद्म भूषण नहीं दिया और मात्र 20 वर्ष पहले आए सैफ अली खान को नवाजा गया हैं। ऋ षि कपूर के बाद फिल्मों में आने वाले तथा उनसे कहीं कमतर कलाकारों को पुरस्कारों से नवाजा जा रहा है क्योंकि इस देश में कदाचित हर पुरस्कार के लिए सिफारिश चाहिए और ऋ षि कपूर उस परिवार से हैं, जहां दो सदस्यों को दादा फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ है। ऋषि कपूर की दूसरी पारी ज्यादा रचनात्मक और प्रभावी रही। स्वयं ऋषि कपूर अपने साक्षात्कार में कहते थे की पहली पारी में हाथ में गिटार लिए लवर बॉय की इमेज से उकता गए थे। दूसरी पारी में उन्होने सहकलाकार और नकारात्मक छवि की फिल्म दो दुनी चार, अग्निपथ, मुल्क जैसी फिल्में की जो उनकी अभिनय क्षमता की गइराई को दर्शाती है। ऋषि कपूर संभवत: इस मायने में सबसे ज्यादा भाग्यशाली सितारा होंगे जिन पर सबसे अधिक सुपर हिट गाने फिल्माए गए हैं। ऋषि कपूर के दौर में अमिताभ और धमेन्द्र जैसे नायक लगातार एक्शन फिल्में दे रहे थे उस समय उन्होने अपनी स्ट्रेन्थ पर भरोसा किया और सिर्फ रोमेंटिक फिल्में करते रहे और उमें सफल हुए। कलाकार वो ही बड़ा होता है जिसे अपने कमजोर और मजबूत पक्ष का भान हो। उस दौर में आलोचकों ने यह भी लिखा कि ऋषि कपूर की एकल सफल फिल्में बहुत कम हैं उन्हें कंधे की जरूरत होती है। कुछ हद तक यह सही भी था। वे अगर संजीदा होते तो आश्चर्य की बात होती उन्हें मस्त मौला तो होना ही था क्योंकि वे कपूर खानदान से आते है जो अपनी बिंदास छवि के लिए प्रख्यात हैं। उनके निधन पर उन्हीं पर फिल्माए एक गीत के बोल कानों में गूंज रहें हैं-एक दिवाना था, क्या उम्र क्या शंमा क्या जमाना था ........... सादर नमन

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