कैकेयी का संताप
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
कैकेयी को रामायण का सबसे नकारात्मक किरदार माना जाता है। सामान्यतौर पर यही धारणा विद्यमान है की कैकेयी की वजह से ही भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास झेलना पड़ा और साथ ही जिस राजपाठ के वे अधिकारी थे उसे भी उन्हें खोना पड़ा। जिसके लिए कैकेयी को तमाम लानतें भी दी जाती हैं, और महाराज दशरथ की मृत्यु का भी दोषी माना जाता है। रामचरित मानस में कैकेयी को ‘पापिन’, ‘कलंकिनी’ जैसे तमाम वाक्यों से संबोधित किया गया है। उल्लेखनीय है कि इंडोनेशियाई कावी, मलेशियाई,बर्मा, जापानी, नेपाल,थाईलैंड,तुर्किस्तान,मंगोलियाई भाषा, फारसी, फिलीपींस, चीन, अरबी सहित 22 से अधिक भाषाओं में रामायण लिखी गई है। कैकेयी के पात्र को लेकर विभिन्न भाषाओं की रामायणों में अलग-अलग चित्रण किया गया है। कैकेयी की मां का निधन उनके बचपन में ही हो गया था। तब उनकी देखभाल मंथरा नामक दासी द्वारा की गई और अपने कुटिल स्वभाव के कारण वह जल्द ही कैकेयी का मन-मस्तिष्क समझने में सफल रही। एक विषय प्रचलन में हैं कि जब राजकुमार राम को राजा बनाने की योजना बन रही थी, ठीक उसी समय देवताओं में भारी चिंता उत्पन्न हुई की अगर राम राजा बन जाते हैं तो सामान्य राजकाज और भोग-विलास में उनका जीवन कट जाएगा चूंकि वह भगवानन विष्णु के अवतार थे, जिन्हें राक्षसों का नाश करने के लिए धरती पर अवतार लेना पड़ा था, इसलिए ‘बुराई का नाश’ करने का उद्देश्य ही खतरे में दिखाई पडऩे लगा था। इस समस्या से निजात पाने हेतु देवताओं की सलाह पर ज्ञान की देवी सरस्वती मंथरा की जिव्हा पर विराजमान हो गयीं और उससे वही कहलवाया जिससे राम वन जा सकें। इसके अलावा दूसरा मत रंगनाथ रामायण के तेलगु संस्करण में यह दर्शाया गया है कि बालकाण्ड में राम अपने भाइयों के साथ छड़ी और गेंद के साथ खेल रहे थे। इसी दौरान मंथरा ने उनकी गेंद को दूर फेंक दिया। क्रोध में राम ने मंथरा के घुटने पर छड़ी से प्रहार किया, जिसके कारण मंथरा का घुटना चोटिल हो गया। कैकेयी को अपनी प्रिय दासी के साथ किया गया यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, जिसकी शिकायत उन्होंने महाराज दशरथ से कर दी। इसके बाद ही महाराज को अपने बच्चों की शिक्षा की चिंता हुई। बालकाण्ड की इस घटना को लेकर मंथरा ने राम के प्रति बैर पाल लिया और वक्त आने पर उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। कहते हैं कि राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी को भडक़ाने का काम मंथरा ने ‘बदला’ लेने की नीयत के कारण ही किया था। कैकेयी जो अपने पुत्र से अधिक भगवान राम को स्नेह प्रेम करती थी, वह क्यों उन्हें वनवास देने के लिए कैसे राजी हो गई इसे लेकर सोशल मीडिया, ब्लाग और कुछ अखबारों में भी एक किस्सा बहुत छपा है लेकिन किसी में भी इस घटना किसी ने भी संदर्भ और स्त्रोत नहीं बताया है। इसलिए इस कथा की लेखक पुष्ठी नहीं करता है। सोशल मीडिया पर प्रचलित इस कथा के अनुसार राजा दशरथ जब भी युद्ध पर जाते कैकेयी को साथ ले जाते थे। क्योंकि कैकेयी कैलेयी युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्र और रथ चलाने में निपुण थी। एक बार किष्किंधा नरेश राजा बाली का युद्ध दशरथ से हुआ जैसा की ज्ञातव्य है कि बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जो भी शत्रु उसके सामने आकर युद्ध करेगा, उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाएगी। महाराज दशरथ के साथ भी यही हुआ, परिणामस्वरूप उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। जिस पर बाली ने राजा दशरथ से कहा कि या तो अपनी पत्नी को यहां छोड़ जाओ या फिर अपना मुकुट उतारकर यहीं रख दो। कैकेयी के सम्मान को बचाने के लिए राजा दशरथ अपना मुकुट बाली के महल में छोड़ आए। इस बात को कैकेयी कभी नहीं भूल पाई और स्वयं को माफ नहीं कर पाई कि उसके पति को उसकी वजह से अपना मुकुट, जो किसी भी राजा के सम्मान का प्रतीक है, गंवाना पड़ा। यह मुकुट रघुकुल की शान थी। वह हमेशा इसी चिंता में रहने लगी कि कैसे वह मुकुट बाली के महल से वापस लाया जा सके। वनवास के समय कैकेयी ने श्री राम आग्रह किया था कि लौटते समय बाली से वह मुकुट अवश्य साथ लाएं। जब राम और बाली का युद्ध हुआ, तब बाली को भगवान राम से मात मिली। भगवान राम ने उन्हें अपना परिचय दिया और उस मुकुट के विषय में पूछा। तब बाली ने उन्हें बताया कि रावण उनके महल से वह मुकुट लेकर भाग गया है। बाली ने कहा कि उनके पुत्र को भगवान राम अपनी शरण में लेलें, वह उन्हें मुकुट वापस लाकर देगा। बाली का पुत्र अंगद, श्रीराम की सेना में शामिल हो गया और भगवान राम का दूत बनकर रावण की सभा में पहुंचा। वहां उन्होंने अपने पांव जमा दिए और सभा में बैठे लोगों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दी। सभा में बैठा कोई भी व्यक्ति अंगद की इस चुनौती को पूरा नहीं कर पाया, जैसे ही रावण अंगद का पैर उठाने के लिए झुका उसका मुकुट गिर गया। अंगद ने वह मुकुट उठा लिया और राम को सौंप दिया। कारण कुछ भी हो परन्तु कैकेयी को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी। कैकेयी पुत्र भरत ने दोनों कृत्यों के लिए अपनी मां को ही दोषी माना और उनसे माता कहलाने का अधिकार तक छीन लिया था और उसे अंत तक अपमानित होना पड़ा।
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
कैकेयी को रामायण का सबसे नकारात्मक किरदार माना जाता है। सामान्यतौर पर यही धारणा विद्यमान है की कैकेयी की वजह से ही भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास झेलना पड़ा और साथ ही जिस राजपाठ के वे अधिकारी थे उसे भी उन्हें खोना पड़ा। जिसके लिए कैकेयी को तमाम लानतें भी दी जाती हैं, और महाराज दशरथ की मृत्यु का भी दोषी माना जाता है। रामचरित मानस में कैकेयी को ‘पापिन’, ‘कलंकिनी’ जैसे तमाम वाक्यों से संबोधित किया गया है। उल्लेखनीय है कि इंडोनेशियाई कावी, मलेशियाई,बर्मा, जापानी, नेपाल,थाईलैंड,तुर्किस्तान,मंगोलियाई भाषा, फारसी, फिलीपींस, चीन, अरबी सहित 22 से अधिक भाषाओं में रामायण लिखी गई है। कैकेयी के पात्र को लेकर विभिन्न भाषाओं की रामायणों में अलग-अलग चित्रण किया गया है। कैकेयी की मां का निधन उनके बचपन में ही हो गया था। तब उनकी देखभाल मंथरा नामक दासी द्वारा की गई और अपने कुटिल स्वभाव के कारण वह जल्द ही कैकेयी का मन-मस्तिष्क समझने में सफल रही। एक विषय प्रचलन में हैं कि जब राजकुमार राम को राजा बनाने की योजना बन रही थी, ठीक उसी समय देवताओं में भारी चिंता उत्पन्न हुई की अगर राम राजा बन जाते हैं तो सामान्य राजकाज और भोग-विलास में उनका जीवन कट जाएगा चूंकि वह भगवानन विष्णु के अवतार थे, जिन्हें राक्षसों का नाश करने के लिए धरती पर अवतार लेना पड़ा था, इसलिए ‘बुराई का नाश’ करने का उद्देश्य ही खतरे में दिखाई पडऩे लगा था। इस समस्या से निजात पाने हेतु देवताओं की सलाह पर ज्ञान की देवी सरस्वती मंथरा की जिव्हा पर विराजमान हो गयीं और उससे वही कहलवाया जिससे राम वन जा सकें। इसके अलावा दूसरा मत रंगनाथ रामायण के तेलगु संस्करण में यह दर्शाया गया है कि बालकाण्ड में राम अपने भाइयों के साथ छड़ी और गेंद के साथ खेल रहे थे। इसी दौरान मंथरा ने उनकी गेंद को दूर फेंक दिया। क्रोध में राम ने मंथरा के घुटने पर छड़ी से प्रहार किया, जिसके कारण मंथरा का घुटना चोटिल हो गया। कैकेयी को अपनी प्रिय दासी के साथ किया गया यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, जिसकी शिकायत उन्होंने महाराज दशरथ से कर दी। इसके बाद ही महाराज को अपने बच्चों की शिक्षा की चिंता हुई। बालकाण्ड की इस घटना को लेकर मंथरा ने राम के प्रति बैर पाल लिया और वक्त आने पर उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। कहते हैं कि राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी को भडक़ाने का काम मंथरा ने ‘बदला’ लेने की नीयत के कारण ही किया था। कैकेयी जो अपने पुत्र से अधिक भगवान राम को स्नेह प्रेम करती थी, वह क्यों उन्हें वनवास देने के लिए कैसे राजी हो गई इसे लेकर सोशल मीडिया, ब्लाग और कुछ अखबारों में भी एक किस्सा बहुत छपा है लेकिन किसी में भी इस घटना किसी ने भी संदर्भ और स्त्रोत नहीं बताया है। इसलिए इस कथा की लेखक पुष्ठी नहीं करता है। सोशल मीडिया पर प्रचलित इस कथा के अनुसार राजा दशरथ जब भी युद्ध पर जाते कैकेयी को साथ ले जाते थे। क्योंकि कैकेयी कैलेयी युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्र और रथ चलाने में निपुण थी। एक बार किष्किंधा नरेश राजा बाली का युद्ध दशरथ से हुआ जैसा की ज्ञातव्य है कि बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जो भी शत्रु उसके सामने आकर युद्ध करेगा, उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाएगी। महाराज दशरथ के साथ भी यही हुआ, परिणामस्वरूप उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। जिस पर बाली ने राजा दशरथ से कहा कि या तो अपनी पत्नी को यहां छोड़ जाओ या फिर अपना मुकुट उतारकर यहीं रख दो। कैकेयी के सम्मान को बचाने के लिए राजा दशरथ अपना मुकुट बाली के महल में छोड़ आए। इस बात को कैकेयी कभी नहीं भूल पाई और स्वयं को माफ नहीं कर पाई कि उसके पति को उसकी वजह से अपना मुकुट, जो किसी भी राजा के सम्मान का प्रतीक है, गंवाना पड़ा। यह मुकुट रघुकुल की शान थी। वह हमेशा इसी चिंता में रहने लगी कि कैसे वह मुकुट बाली के महल से वापस लाया जा सके। वनवास के समय कैकेयी ने श्री राम आग्रह किया था कि लौटते समय बाली से वह मुकुट अवश्य साथ लाएं। जब राम और बाली का युद्ध हुआ, तब बाली को भगवान राम से मात मिली। भगवान राम ने उन्हें अपना परिचय दिया और उस मुकुट के विषय में पूछा। तब बाली ने उन्हें बताया कि रावण उनके महल से वह मुकुट लेकर भाग गया है। बाली ने कहा कि उनके पुत्र को भगवान राम अपनी शरण में लेलें, वह उन्हें मुकुट वापस लाकर देगा। बाली का पुत्र अंगद, श्रीराम की सेना में शामिल हो गया और भगवान राम का दूत बनकर रावण की सभा में पहुंचा। वहां उन्होंने अपने पांव जमा दिए और सभा में बैठे लोगों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दी। सभा में बैठा कोई भी व्यक्ति अंगद की इस चुनौती को पूरा नहीं कर पाया, जैसे ही रावण अंगद का पैर उठाने के लिए झुका उसका मुकुट गिर गया। अंगद ने वह मुकुट उठा लिया और राम को सौंप दिया। कारण कुछ भी हो परन्तु कैकेयी को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी। कैकेयी पुत्र भरत ने दोनों कृत्यों के लिए अपनी मां को ही दोषी माना और उनसे माता कहलाने का अधिकार तक छीन लिया था और उसे अंत तक अपमानित होना पड़ा।

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