..........तो ऐसे बना रामायण धारावाहिक 



33 वर्ष बाद पुन: रामायण धारावाहिक के पुन: प्रसारण ने टीआरपी के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं। आज भी इस धारावाहिक को उतनी ही शिद्दत के साथ देखा जा रहा है। रामायण धारावाहिक उस समय एकदम सुगमता से नहीं बना उसमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस विषय में स्व.रामानंद सागर के बेटे व रामायण धारावाहिक के सहायक निर्देशक रहे प्रेम सागर ने अपने पिता के जीवन संघर्ष के बारे में बताया और उन्होंने पिता पर लिखी किताब एन एपिक लाइक ऑफ रामानंद सागर फ्रर्म बरसात टू रामायण की भी जानकारी दी। रामानंद सागर पर उक्त किताब उनके पोते शिव सागर ने रिसर्च के पश्चात लिखी है। प्रेम सागर ने बताया कि रामानंद सागर की सबसे पहली फिल्म बरसात थी। किसी ने नहीं सोचा था कि एक आदमी जिसने चपरासी का काम किया, सडक़ पर साबुन बेचे, जर्नलिस्ट बने और मुनीम का काम किया। वो आदमी एक दिन रामायण बना सकता है। बात 1976 की बात है रामानंद अपने चार बेटों सुभाष, मोती, प्रेम और आनंद के साथ स्विट्जरलैंड में थे। ‘चरस’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी शाम हुई काम निपटा तो रामानंद बेटों के साथ एक कैफे में जा बैठे। हाड़ कंपाने वाली सर्दी पड़ रही थी, रामानंद सागर ने रेड वाइन का जग ऑर्डर किया. एक फ्रंच सा दिखने वाला शख्स वाइन सर्व करने आया। उसने लकड़ी का एक रेक्टेंगल बॉक्स खिसकाकर उनके सामने रख दिया, जिसमें सामने की तरफ लकड़ी के दो पल्लड़ लगे थे। उस आदमी ने दोनों पल्लड़ खिसकाए और स्विच ऑन किया। स्क्रीन पर कलर फिल्म चल पड़ी। रामानंद और उनके बेटे हैरान थे, क्योंकि वो रंगीन टीवी थी, इससे पहले उन्होंने कभी रंगीन टीवी पर फिल्म नहीं देखी थी। बस वही वो पल था, जब रामानंद सागर के मन में टीवी की तरफ मुडऩे का ख्याल आया। हाथ में रेड वाइन का गिलास लिए रामानंद बड़ी देर तक स्क्रीन निहारते रहे। जब नजऱें स्क्रीन से हटीं, तो बेटों के सामने एक फैसला सुनाया, मैं सिनेमा छोड़ रहा हूं मैं टेलीविजन इंडस्ट्री में आ रहा हूं। मेरी जिंदगी का मिशन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सोलह गुणों वाले श्री कृष्ण और आखिर में मां दुर्गा की कहानी लोगों के सामने लाना है। जो एक फिल्म में संभव नहीं है धारावाहिक की शक्ल में ही पूरा हो सकता है। जब रामानंद सागर ने ‘रामायण’ बनाने का ऐलान किया, तो लोगों का मिलाजुला रिएक्शन आया, ज्यादातर लोगों ने उनके इस फैसले की आलोचना की, लेकिन वो तय कर चुके थे। इंडस्ट्री के लोग सोचते थे कि रामानंद सागर का दिमाग खराब हो गया है. क्योंकि हमारा अपना प्रोडक्शन हाउस था, हम सिनेमा में अच्छा काम कर रहे थे, तो टीवी के लिए काम करने का क्यों सोच रहे हैं? लेकिन ये सीरियल देखा गया और इतना देखा गया कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया। सन्1987 को रामायण का पहला एपिसोड टेलीकास्ट हुआ। इसने टीवी इंडस्ट्री में इतिहास बना दिया। परन्तु सब आसान नहीं था रामानंद सागर ने ‘रामायण’ के पैम्फ्लेट छपवाए और घोषणा कर दी कि उन्हें वीडियो कैसेट्स के जरिए लॉन्च किया जाएगा। उनके बेटे प्रेम ने बायोग्राफी में ‘रामायण’ की तैयारी का एक किस्सा बताया है कि कैसे उनके दोस्तों ने भी इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकर अपने हाथ खींच लिए। उन्होने बताया कि पापा ने मेरे दुनियाभर की टिकट खरीदी, विदेशों में बसे उनके अमीर दोस्तों की कॉन्टेक्ट लिस्ट पकड़ाई और अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए पैसा इक_ा करने के लिए बिजनेस ट्रिप पर भेज दिया। उनके दोस्तों में से कई लोग इस प्रोजेक्ट को लेकर असमंजस में थे। कुछ ने अपने सेक्रेटरी को इशारा करके मुझे विनम्रता से ऑफिस से बाहर करा दिया। पापाजी के एक करीबी दोस्त ने मुझे सलाह दी कि पापा को थोड़ा समझाओ कि क्या करने जा रहे हैं, एक महीने यहां से वहां घूमने के बाद मैं खाली हाथ वापस लौट आया। रामानंद सागर के नज़रिये से ‘रामायण’ को खरीदने वाला कोई नहीं था। रामानंद सागर विक्रम और वेताल बना चुके थे जो बच्चों को खासा लोकप्रिय हो चुका था और विक्रम और बेताल की स्टार कास्ट को ही ‘रामायण’ में फाइनल कर दिया. ‘विक्रम और बेताल’ के ‘राजा’ अरुण गोविल बने ‘राम’ और कई एपिसोड्स में रानी के किरदार में नजर आई दीपिका चिखालिया ‘सीता’ बन गईं. राजकुमार सुनील लाहरी को ‘लक्ष्मण’ और दारा सिंह को ‘हनुमान’ के रोल में कास्ट कर दिया। रामानंद सागर के टीवी इंडस्ट्री में आने को लेकर कई बातें कही गईं, लेकिन उनके बेटे ने बायोग्रफी में जो बातें कहीं, वो कुछ अलग थीं जिसमें उन्होने बताया कि दुबई के माफियाओं की फिल्म इंडस्ट्री में दखलअंदाजी बढ़ती जा रही थी, फिरोज़ खान की फिल्म ‘कुर्बानी’ के ओवरसीज राइट्स का निपटारा माफिया ने ही करवाया था न सिर्फ पापाजी बल्कि कई और दिग्गज फिल्म मेकर्स का मानना था कि बॉलीवुड का भविष्य अंधकार में है क्योंकि दुबई में बैठे आका लगातार फिल्म बिजनेस को अपने कंट्रोल में करते जा रहे थे। ‘रामायण’ को दूरदर्शन यानी टीवी पर लाने को लेकर तात्कालीन सरकार दुविधा में थी लेकिन डीडी के अधिकारियों ने अपने तर्क रखे, उन्होंने कहा कि ये सीरियल हमारे आधिकारिक सांस्कृतिक महाकाव्य पर आधारित है। जिसका धार्मिक होना जरूरी नहीं, खुद वाल्मिकी ने ‘रामायण’ में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का वर्णन एक इंसान के तौर पर किया है। ‘रामायण’ टेलीकास्ट होना शुरू हुआ, लेकिन इसके बाद भी कई दिक्कते आईं। किताब में प्रेम ने लिखा सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन दिल्ली के गलियारों से एक तूफान चला आ रहा था। कुछ सत्ताधारियों को लग रहा था कि ‘रामायण’ का दूरदर्शन पर प्रसारण उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. ज़ाहिर है, तात्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री की तरफ से एक बड़ी आपत्ति आई। उन्हें लगा कि हिंदू पौराणिक धारावाहिक हिंदू शक्ति को जन्म देगा, जिससे विपक्ष का वोट बैंक बढ़ सकता है. उन्हें डर था कि ‘रामायण’ हिंदूओं में गर्व की भावना पैदा करके भाजपा की सत्ता में आने की संभावनाएं बढ़ाएगा, दूसरी ओर, सुनने में ये आ रहा था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद डीडी के अधिकारियों सुझाव दिया है कि ‘रामायण’ जैसे महान भारतीय महाकाव्यों का प्रसारण किया जाए क्योंकि ये महाकाव्य हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। सीरियल को लेकर लंबे वक्त तक दिल्ली के मंडी हाउस में बने डीडी हैड क्वाटर और ब्यूरोक्रेसी में खींचतान चलती रही, इस बारें प्रेम लिखते हैं कि पापाजी ने कई हफ्तों और महीनों तक दिल्ली में चक्कर लगाए, वो घंटों डीडी के दफ्तर और दूसरे अधिकारियों के ऑफिस के बाहर खड़े रहते थे, कई बार वो हफ्तों तक दिल्ली के अशोक होटल में सिर्फ इसलिए ठहरे रहते कि उनके पास कोई कॉल आएगा या उन्हें फलां अधिकारी का अपॉइन्टमेंट मिलेगा। लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. एक बार वो सुबह-सुबह किसी ब्यूरोक्रेट के घर पहुंच गए, अधिकारी और उनकी पत्नी गार्डन में टहल रहे थे, लेकिन उन्होंने कहा कि मीटिंग के लिए वक्त नहीं है। ये शो ऐसी अंधेरी गुफा बन रहा था, जिसमें रोशनी की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। नतीजा रहा कि ‘रामायण’ के चार पायलट एपिसोड्स एक एपिसोड में सिमट गए। श्री सागर को जिल्लत का भी भी सामना करना पड़ा, मंडी हाउस का एक चपरासी जो एक के ऊपर एक चारों एपिसोड्स की कैसेट हाथ में पकड़े हुआ था, उसने पापाजी को वो बातें बताईं, जो डीडी के क्लर्क उनके बारे में कह रहे थे. उसे नहीं पता कि डायलॉग्स कैसे लिखे जाते हैं, सीरियल में भाषा को और बेहतर होने की जरूरत है. रामानंद सागर के लिए ये बेहद शर्मिंदगी से भरा था। नवंबर 1986 में नए सूचना एवं प्रसारण मंत्री अजीत कुमार पंजा आए और चीजें बेहतर हो गईं।

Comments

Popular posts from this blog