सत्ता के लिए सभी रेंगते नजर आए
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
बैतूल। महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे के बाद इतने विशाल देश में और कुछ घटित ही नहीं हो रहा था घड़ी ‘स्टॉप वॉच’ की तरह हो गई और इलेक्ट्रानिक मीडिया के पास कुछ दिखाने के लिए कुछ नहीं रहा। कॉमडी शो नॉन स्टॉप चलाया जाता रहा और दर्शकों को ब्रेकिंग न्यूज़ और सूत्रों के हवाले से खांमखां की सनसनी परोसी जाती रही। इस घटनाक्रम से एक मायने में पहली बार उजागर हुआ है कि सत्ता के लिए राजनैतिक दल किस हद तक गिर सकते हैं। महाराष्ट्र चुनाव में भारतीय राजनीति का सबसे गंदा चेहरा सामने आया जहां सभी राजनैतिक दलों ने अपने ‘तथाकथित सिद्धांतों’ को ताक पर रखकर सिर्फ सत्ता के लिए रेंगते नजर आए। अमित शाह और मोदी चुनाव प्रचार के दौरान गली-गली में बोलते रहे कि महाराष्ट के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फणवीस होंगे तब तक उद्धव ठाकरे ने कोई आपत्ति नहीं बताई की हमारे बीच ढाई-ढाई साल का सौदा हुआ है, नतीजों के बाद भाजपा की बहुमत में कम आती सीटों को देखकर ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर अड़ गए। बेसब्री भाजपा ने गरम गुलाब जामुन मुंह में भरते हुए प्रात: तडक़े शपथ ले डाली वह भी अजीत पंवार के साथ मिलकर जिनपर भ्रष्टाचार के मामले चल रहें हैं। कांग्रेस का राजनैतिक ग्राफ कितना भी नीचे आ गया हो उनके पास गर्व करने की एक ही बात थी कि उन्होने कभी धार्मिक सम्भाव को नहीं छोड़ा। कांग्रेस ने भी बाला साहेब की हिंदु राष्ट्र का सपना देखने वाली शिवसेना के साथ हाथ मिला लिया। गोया की सत्ता आक्सीजन हो गई है जिसके लिए राजनैतिक प्रदुषित फिजा में दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाकर उसी ब्रांड का आक्सीजन सिलेंडर लगा लिया जाता है। क्षणिक लाभ के लिए सिद्धांत खोखले साबित हो गए हैं। अब राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता स्वयं को ठगा महसूस कर रहें और सोशल मीडिया में बेतुके तर्क दे रहे हैं। जनता मौन है, ध्यान से घटनाक्रम को देख रही है, कुछ दिनों बाद सबकुछ भूल जाने के लिए, जैसी अवाम की तासीर है। हमारे अंदर के न्यायालय स्वत: प्रेरणा से अपराध को संज्ञान में नहीं लेते हैं। राजनेताओं की बात अलग है वे अपनी सत्ता की भट्टी को जलाने के लिए आवाम को इधन की तरह झौंकते रहें हैं यह उनके विकास के मुद्दों से भटकाने का हथियार हैं। इस धारावाहिक में मीडिया संजय राउत, शरद पंवार, अमित शाह चाणक्य होने का प्रशस्ति पत्र देता रहा। हर किसी को आजकल चाणक्य की उपाधि से नवाजा जा रहा है। इस संदर्भ में बैतूल के वरिष्ठ कलमकार लक्ष्मी नारायण साहू ने तीखा व्यंग करते हुए अपने कॉलम बकलोल बोल में लिखा है कि आजकल तो सियासत का हर चपडग़ंजू अपने आप को चाणक्य समझने लगा है। पिछले कुछ सालों में चाणक्य वो तमगा गमछा हो गया कि हर ऐरा गैरा इसको गाले में डालकर शान घूम रहा। सांसद के चुनाव से लेकर वार्ड पार्षद और पंच तक के चुनाव में ऐसे-ऐसे चाणक्य अवैध चाणक्य पैदा हो रहे कि मर-खप इतिहास में दफन हो चुके हैं। चाणक्य अगर आज जिंदा होते तो अब तक अपने नाम परिवर्तन की सूचना का इश्तहार अखबार में छपवा चुका होते। दरअसल कोई चाणक्य नहीं है सब सत्ता के भूखे हैं।
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
बैतूल। महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे के बाद इतने विशाल देश में और कुछ घटित ही नहीं हो रहा था घड़ी ‘स्टॉप वॉच’ की तरह हो गई और इलेक्ट्रानिक मीडिया के पास कुछ दिखाने के लिए कुछ नहीं रहा। कॉमडी शो नॉन स्टॉप चलाया जाता रहा और दर्शकों को ब्रेकिंग न्यूज़ और सूत्रों के हवाले से खांमखां की सनसनी परोसी जाती रही। इस घटनाक्रम से एक मायने में पहली बार उजागर हुआ है कि सत्ता के लिए राजनैतिक दल किस हद तक गिर सकते हैं। महाराष्ट्र चुनाव में भारतीय राजनीति का सबसे गंदा चेहरा सामने आया जहां सभी राजनैतिक दलों ने अपने ‘तथाकथित सिद्धांतों’ को ताक पर रखकर सिर्फ सत्ता के लिए रेंगते नजर आए। अमित शाह और मोदी चुनाव प्रचार के दौरान गली-गली में बोलते रहे कि महाराष्ट के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फणवीस होंगे तब तक उद्धव ठाकरे ने कोई आपत्ति नहीं बताई की हमारे बीच ढाई-ढाई साल का सौदा हुआ है, नतीजों के बाद भाजपा की बहुमत में कम आती सीटों को देखकर ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर अड़ गए। बेसब्री भाजपा ने गरम गुलाब जामुन मुंह में भरते हुए प्रात: तडक़े शपथ ले डाली वह भी अजीत पंवार के साथ मिलकर जिनपर भ्रष्टाचार के मामले चल रहें हैं। कांग्रेस का राजनैतिक ग्राफ कितना भी नीचे आ गया हो उनके पास गर्व करने की एक ही बात थी कि उन्होने कभी धार्मिक सम्भाव को नहीं छोड़ा। कांग्रेस ने भी बाला साहेब की हिंदु राष्ट्र का सपना देखने वाली शिवसेना के साथ हाथ मिला लिया। गोया की सत्ता आक्सीजन हो गई है जिसके लिए राजनैतिक प्रदुषित फिजा में दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाकर उसी ब्रांड का आक्सीजन सिलेंडर लगा लिया जाता है। क्षणिक लाभ के लिए सिद्धांत खोखले साबित हो गए हैं। अब राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता स्वयं को ठगा महसूस कर रहें और सोशल मीडिया में बेतुके तर्क दे रहे हैं। जनता मौन है, ध्यान से घटनाक्रम को देख रही है, कुछ दिनों बाद सबकुछ भूल जाने के लिए, जैसी अवाम की तासीर है। हमारे अंदर के न्यायालय स्वत: प्रेरणा से अपराध को संज्ञान में नहीं लेते हैं। राजनेताओं की बात अलग है वे अपनी सत्ता की भट्टी को जलाने के लिए आवाम को इधन की तरह झौंकते रहें हैं यह उनके विकास के मुद्दों से भटकाने का हथियार हैं। इस धारावाहिक में मीडिया संजय राउत, शरद पंवार, अमित शाह चाणक्य होने का प्रशस्ति पत्र देता रहा। हर किसी को आजकल चाणक्य की उपाधि से नवाजा जा रहा है। इस संदर्भ में बैतूल के वरिष्ठ कलमकार लक्ष्मी नारायण साहू ने तीखा व्यंग करते हुए अपने कॉलम बकलोल बोल में लिखा है कि आजकल तो सियासत का हर चपडग़ंजू अपने आप को चाणक्य समझने लगा है। पिछले कुछ सालों में चाणक्य वो तमगा गमछा हो गया कि हर ऐरा गैरा इसको गाले में डालकर शान घूम रहा। सांसद के चुनाव से लेकर वार्ड पार्षद और पंच तक के चुनाव में ऐसे-ऐसे चाणक्य अवैध चाणक्य पैदा हो रहे कि मर-खप इतिहास में दफन हो चुके हैं। चाणक्य अगर आज जिंदा होते तो अब तक अपने नाम परिवर्तन की सूचना का इश्तहार अखबार में छपवा चुका होते। दरअसल कोई चाणक्य नहीं है सब सत्ता के भूखे हैं।


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