आम आदमी का ’शक्ति प्रदर्शन’
सृष्टि का आखिरी आदमी 
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे

बैतूल। विवेकानंद विज्ञान महाविद्यालय परिसर बैतूल में ‘सृष्टि का आखिरी आदमी’ का मंचन किया गया। एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक और पद्मश्री उपाधी प्राप्त धर्मवरी भारती द्वारा रचित इस नाट्य का निर्देशन शिरीष सोनी ने किया। इस नाटक को हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ख्याति मिली है, लेकिन सिर्फ 60-80 के दशक में, क्योंकि उस दौर में मजदूरों के शोषण का मुद्दा सबसे अहम था यही कारण है कि उस दौर में मजदूर यूनियन भी अपने शबाब पर थी। धर्मवीर भारती स्वयं कार्ल माक्र्स  से प्रभावित थे, धर्मवीर भारती के लेखन में गजब का विरोधाभास भी क्योंकि समाज की आर्थिक खाई, रोमांस और व्यंग पर भी उन्हानेे अपनी कलम सलीके से चलाई। आज के नाटक में आम आदमी की व्यथा को दर्शाया गया है जो एक हद तक शोषित होता है उसके बाद वह प्रतिकार की मुद्रा में आता है, द्योतक है इस बात का कि रबरबैंड को एक सीमा तक ही खींचा जा सकता है। मंचित हुए नाटक में ‘मुर्दा’ जय खातरकर और ‘शासक’ साहिल खान ने शानदार अभिनय किया जिसमें जय खातरकर ने अभिनय में जान फूंक दी उनकी बॉडी लैंग्वेज कमाल की थी परन्तु खाकसार को बैतूल में पूर्व में हुए नाटकों की तरह इस बार भी पीढ़ा रही कि संवाद अदायगी पर वे झोल खा जाते हैं। जय खातरकर संवाद बहुत लाउड बोल रहे थे जिसके कारण वे दर्शकों के कानों में थोड़ा कर्कश का अनुभव जरूर करा रहे थे और संवाद को समझने के लिए दिक्कत हो रही थी, क्योकि अधिकत्तर दर्शक ऐसे होते हैं जिन्होने संवाद पहली बार सुने होते हैं। गौरतलब है कि विगत वर्ष जेएच कॉलेज में छिंदवाड़ा की नाट्यसंस्था ज्ञान गंगा द्वारा नाटक ‘तितली’ की प्रस्तुति दी गई थी। नाट्य संस्था ने बताया कि नाटक के सभी कोनों पर कैसे दबिश भी जाती है यहां तक के सूत्रधार रोहित रूसिया मंच पर नहीं होते हुए भी अपनी उपस्थिति जताते रहे। संवाद का महत्व सिर्फ इस बात से समझा जा सकता है कि ऋतिक रोशन जो नृत्य, एक्शन और अभिनय में शीर्ष स्थान रखते हैं लेकिन उनके उच्चारण में साफ नहीं होने के कारण सुपर स्टार नहीं बन पाए वहीं औसत चेहरे के अजय देवगन और इरफान खान अभिनय और अपनी संवाद अदायगी के कारण जमे हुए हैं। शिरीष और उनकी टीम बधाई की पात्र है जिन्होने बैतूल जैसे छोटे शहर में इस तरह के मंचन करते रहें हैं, यह भी सही है कि हम जैसे कलम घसियारे समीक्षा कर देते हैं परन्तु प्रकल्प के पीछे के मेहनत को समझ पाने से महरूम होते हैं। सुझावों को सकारात्मक तरीके से लिया जाए तो ही सुधार होते है और सुधार की गुंजाईश हमेशा होती है। फाईनल रिहर्सल के समय यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि सांउड के साथ नाटक कैसा संपादित हो रहा है। समीक्षक कोई कसर बताता है तो उसे इस तरह कबूल किया जा सकता है कि उसने कितनी शिद्दत के साथ नाटक देखा। इस नाटक में सबसे ज्यादा पेशेवर पक्ष उसका मंच और मंचीय सज्जा थी जिसे श्रेणिक जैन ने तैयार की थी जिसमें कहानी के अनुरूप पेंटिंग्स थी। एक घंटे के नाटक में किरदार बदलते रहें मंच लगभग वही था ऐसे में मंच का कहानी से जुड़ा होना तुरूप का इक्का रही। संगीत संयोजन ब्रजकिशोर वानखेड़े व दिलीप राव का व प्रकाश संयोजन दिव्यांशु गौस्वामी का था जो ठीक था। सूत्रधार पल्लवी लोखंडे और लुभांश गुरव ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। नाटक में लोकतंत्र के साईड इफेक्ट को भी खुबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। आज के नाटक का लब्बोलुवाब लोकप्रिय विचारधारा पर आधारित है कि कमजोर विपक्ष, बिका हुआ पत्रकार और सोई हुई जनता देश के बंटाढार करने के लिए काफी होती है। नाटक को कठित ढंग से परिभाषित करने की जरूरत नहीं है फकत उस दृश्य को समझिए जिसमें बच्चा किसी चीज के लिए अड़ जाता है और जमीन पर लोटता हैं, मां-बाप कहते हैं ज्यादा ‘नाटक’ मत करो, क्या बच्चा नाटक करता है, जी हां वह नाटक करता है खालीस और शफ्फाक नाटक। गोया की बस यही समझ लिजीए नाटक इतना ही आसां है और इतना ही मुश्किल। 

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