रिसर्च की मिस्की में पिसी महान फनकारी ‘83’
स्टे्रट ड्राईव बाय सपन दुबे
1983 क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत पर बनी फिल्म 83 रिलीज़ हुई है। फिल्म दो वर्ष पूर्व बनकर तैयार थी परन्तु कोविड 19 के चलते सिनेमाघर बंद हो गए। निर्माता ने ठान रखा था कि फिल्म को ओटीटी पर रिलीज ना करते हुए बड़े पर्दे पर ही रिलीज की जाएगी। फिल्म के विलंब से आने के कारण निर्माताओं को भारी नुकसान हुआ है। 1983 के विश्व विजेता बनते ही क्रिकेट का शानदार तरीके से प्रबंधन करते हुए बीसीसीआई ने अथाह धन कूटा और सुनियोजित तरीके से इसका व्यवसायिकरण किया। हॉकी में विश्व विजय और ऑलम्पिक विजेता होने के बाद भी हॉकी फेडरेशन इसको भुना नहीं पाया। 1983 की जीत के मायने कई लिहाज से अलग थे। बतौर रणवीर सिंह आज की प्रोढ़ पीढी के पास 1983 विश्व कप की यादें ताजा है और सबके पास एक अलग कहानी है जिसमें कोई कहता है कि फाईनल के दिन मौसी आई थी, हमने रेडियो खरीदा था इत्यादि। फिल्म में रणवीर कपूर ने कपिल देव का किरदार निभाया है जो बहुत ही मुश्किल था। कपिल की तरह बल्लेबाजी तो शायद आसान हो सकती है लेकिन वैसी गेंदबाजी बहुत मुश्किल थी क्योंकि कपिल का बॉलिंग एक्शन बहुत ही यूनिक है, उनका हाई आर्म डिलिवरी,साइड चेस्ट एक्शन, कपिल को बॉल फेंकने के लिए भागते हुए देखने में ही एक रोमांच का अनुभव होता था। जिसके लिए रणवीर ने बाकायदा कपिल देव से मोहाली में कई दिनों तक कोचिंग ली। रणवीर बाजीराव मस्तानी के बाद इस फिल्म में भी अपने अभिनय का लोहा मनवा रहें हैं। इस फिल्म के बाद उनका नाम संपूर्ण अभिनेताओं की फेरिस्त में शुमार होगा। एक कलाकार कितनी शिद्दत से एक किरदार को जी सकता है जिसकी पराकाष्ठा रणवीर ने पर्दे पर दिखाई। उन्होने सिर्फ मैदान ही में नहीं बल्कि कपिल के बोलने के अंदाज तक को भी बखूबी निभाया है। इसके अलावा ताहिर राज जिन्होने सुनील गावस्कर के रोल में स्टांस और चाल तक पर काफी गहरा अध्ययन किया और लाजवाब काम किया। पंकज त्रिपाठी, दिपीका पादुकोण सामान्य रहे। फिल्म की एक खास बात यह थी की संदीप पाटिल का किरदार उनके बेटे चिराग पाटिल ने निभाया है और मोहिन्दर अमरनाथ के पिता लाला अमरनाथ का रोल खुद मोहिंदर अमरनाथ ने किया है। 1983 टीम का हिस्सा बलविंदर सिंह संधु पूरी समय यूनिट पर साथ रहते थे और कलाकारों के प्रशिक्षण का हिस्सा भी रहे। भारत में आम आदमी क्रिकेट से प्रेम करता है। पान बेचने वाले तक स्वयं को इस खेल का विशेषज्ञ मानते हैं। क्रिकेट भारत को एक सूत्र में बांधता है लोकप्रिय विचार है कि भारतीय में देशभक्ति के दर्शन सिर्फ युद्ध के समय, टॉकिज में और क्रिकेट मैच में होते हैं। यहां तक के उस समय भारत में दंगा रोकने के लिए विश्व कप का सहारा लिया गया लोग दंगा भूलकर साथ में मैच देखने लगे थे। फिल्म में एक मार्मिक संवाद है जब पंकज त्रिपाठी (भारतीय टीम का मैनेजर) को बेइज्जत किया जाता है तो वह कपिल देव से कहते हैं आजादी 35 साल पहले जीत ली है पर अभी इज्जत जीतना बाकी है। क्रिकेट की दिवानीगी उस समय दिखती है जब एक गर्भावस्था के दौरान फाईनल मैच देख रही महिला को प्रसव पीढ़ा होती है उसे अस्पताल ले जाया जाता है और वह स्टे्रचर पर स्कोर पूछती रहती है। कपिल की मां की भूमिका नीना गुप्ता ने निभाई है। क्या इस रोल के लिए उन्हें चुनने के पीछे कोई मकसद था। गौरतलब है कि विव रिचर्डस और नीना गुप्ता लिव इन रिलेशनशिप में रहें हैं और उनसे एक बेटी भी है। निर्देशक कबीर खान ने एक-एक खिलाड़ी पर बारीकी से रिसर्च किया और रिसर्च की मिक्सी में महीन पीसा। आज क्रिकेट का व्यवसायिकरण होने से पिच बल्लेबाजों के पक्ष में बनने लगी हैं जिस पर रन अधिक बने और दर्शक मैच का लुत्फ उठा सके 1983 के दौर में पिच ठप्पा खाकर मानो दुगनी गति पकड़ लेती थी। नियम भी शिथिल कर दिए गए हैं पहले बाउंसर पर की बाध्यता नहीं थी एक ओवर में कितने भी मारे जा सकते थे। उस समय खेलना सही अर्थो में अग्निपरीक्षा थी। आज की पीढ़ी के कुछ लोग भारत की इस जीत को तुक्का समझते हैं तो उन्हें यह फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए क्योंकि वह लोग क्लाईव लायड, गार्डन ग्रीनिज, विव रिचर्ड, जैफ डूजोन, हैंस,होलडिंग, मार्शल, ज्वैल गार्वनर, बार्डर, चैपल, ह्युज, बॉब विलिस, इयान बॉथम, रिचर्ड हैडली आदि की कहर बरपाती गेंदबाजी और बल्लबाजी से रूबरू नहीं है।
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