क्यों फिकी हो रही गुजिया और सेंवई की मिठास
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
घर की दीवार पर कौन सा रंग करवाना है, घर के कार्यक्रमों में खाने का मेन्यु क्या होगा और हलवाई कौन होगा, ऐसी छोटी-छोटी बातें मैं और मेरे दोस्त जिनमें मुस्लिम भी है मिलकर तय करते हैंं। ईद पर सेंवई की खीर के आमंत्रण का कभी रास्ता नहीं देखा और वे दीपावली पर मेरी गुजारिश के लड़े जा रहें हैं। बतौर कुमार विश्वास सोशल मीडिया ऐसा विश्वविद्यालय है जहां सिर्फ चौथी फेल और जड़ बुद्धि का होने ही आवश्यक है और आपको इसकी मानद उपाधि मिल जाती है। यहां सबसे बड़े दोषी वो नहीं है जो अराजकता फैला रहें है, अपराधी वह भी हैं जो अराजकता फैलाने में लिप्त ना होकर भी उत्पातियों के बचाव में पैरवी कर रहा है और जो तटस्थ हैं वे सबसे बड़े गुनाहगार हैं। विदित हो की भरी सभा में द्रोपदी के चीर हरण के समय द्रोण और भीष्म भी खामोश थे। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था की ‘समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ समय लिखेगा उनका भी अपराध’। तटस्थ लोगों को देशहित में खुलकर विरोध करना ही होगा चाहे वह अपने समुदाय के विरूद्ध ही क्यों ना हो। देशभक्ति जताने के लिए सीमा पर लडऩे की जरूरत नहीं है जब देश ऐसी विषम परिस्थति से गुजर रहा है तब अपने हिस्से का सामाजिक दायित्व निभाना अनिवार्य है, इस जिम्मेदारी मुंह मोडऩा कायरता होगी। भले ही उन्मादी नेता माईक से चिल्ला-चिल्ला कर अनाप-शनाप बयान दें पर घोर सच्चाई यह है कि मुस्लिम हिन्दुओं को और हिन्दू मुस्लिमों को इस देश से कभी खत्म नहीं कर सकते हैं। रहना साथ में ही है तो यह बात जितनी जल्दी दिमाग में घुस जाए उतना मुल्क के लिए अच्छा होगा। एक अनाम शायर ने भी लिखा है कि ‘जब तेरे मेरे शीशे के घर, मैं भी सोचूँ तू भी सोच, फिर क्यों है हाथ में पत्थर, मैं भी सोचूँ तू भी सोच’। फिल्म अमर अकबर एंथोनी के एक दृश्य में तीनों मजहब के नायक रक्तदान करते हैं जिसमें रक्तदान की नली एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और रक्त उनकी उनकी उस महिला को सीधे चढ़ाया जा रहा है जिसमें तीनो इस बात से महरूम है कि ये महिला उनकी मां है। यह करतब आजतक चिकित्सा विज्ञान में संभव नहीं हो पाया है। इस दृश्य को लेकर अमिताभ बच्चन ने निर्देशक मनमोहन देसाई के सामने आपत्ति रखी कि यह हास्यापद है जिसे दर्शक स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि तीन रक्तदाताओं और रक्त गृहिता को सीधे रक्त नहीं दिया जाता है। जिस पर श्री देसाई ने कहा कि फिल्म में यह दृश्य जरूर रहेगा और सुपरहिट होगा, और रहा भी। हम उस समय बेतुके दृश्य की तकनीकी कमी को नजरअंदाज करते हुए ताली पीटते रहे क्योंकि उस दौर में मनोरंजन पर जातिवाद की परत नहीं चढ़ पाई थी। गोया की समझदारी इंसान तो बनाती है पर इसकी अधिकता कभी कभी इंसानियत छीन लेती है। अब्दुल पंचर वाला हो या सुरेश हम्माल इनको कभी इस्लाम या हिन्दूत्व खतरे में नजर नहीं आया जो पढ़ लिख गए वो भयभीत हैं और असुरक्षा की भावना उन्हें नाहक ही घेर रही है। इस देश को अनपढ़ों ने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। तथाकथित पढ़े-लिखे लोग मजहब की अजीब-अजीब व्याख्या कर रहें हैं। घातक और फिजूल है ऐसा दानिशवर बनना.....
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
घर की दीवार पर कौन सा रंग करवाना है, घर के कार्यक्रमों में खाने का मेन्यु क्या होगा और हलवाई कौन होगा, ऐसी छोटी-छोटी बातें मैं और मेरे दोस्त जिनमें मुस्लिम भी है मिलकर तय करते हैंं। ईद पर सेंवई की खीर के आमंत्रण का कभी रास्ता नहीं देखा और वे दीपावली पर मेरी गुजारिश के लड़े जा रहें हैं। बतौर कुमार विश्वास सोशल मीडिया ऐसा विश्वविद्यालय है जहां सिर्फ चौथी फेल और जड़ बुद्धि का होने ही आवश्यक है और आपको इसकी मानद उपाधि मिल जाती है। यहां सबसे बड़े दोषी वो नहीं है जो अराजकता फैला रहें है, अपराधी वह भी हैं जो अराजकता फैलाने में लिप्त ना होकर भी उत्पातियों के बचाव में पैरवी कर रहा है और जो तटस्थ हैं वे सबसे बड़े गुनाहगार हैं। विदित हो की भरी सभा में द्रोपदी के चीर हरण के समय द्रोण और भीष्म भी खामोश थे। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था की ‘समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ समय लिखेगा उनका भी अपराध’। तटस्थ लोगों को देशहित में खुलकर विरोध करना ही होगा चाहे वह अपने समुदाय के विरूद्ध ही क्यों ना हो। देशभक्ति जताने के लिए सीमा पर लडऩे की जरूरत नहीं है जब देश ऐसी विषम परिस्थति से गुजर रहा है तब अपने हिस्से का सामाजिक दायित्व निभाना अनिवार्य है, इस जिम्मेदारी मुंह मोडऩा कायरता होगी। भले ही उन्मादी नेता माईक से चिल्ला-चिल्ला कर अनाप-शनाप बयान दें पर घोर सच्चाई यह है कि मुस्लिम हिन्दुओं को और हिन्दू मुस्लिमों को इस देश से कभी खत्म नहीं कर सकते हैं। रहना साथ में ही है तो यह बात जितनी जल्दी दिमाग में घुस जाए उतना मुल्क के लिए अच्छा होगा। एक अनाम शायर ने भी लिखा है कि ‘जब तेरे मेरे शीशे के घर, मैं भी सोचूँ तू भी सोच, फिर क्यों है हाथ में पत्थर, मैं भी सोचूँ तू भी सोच’। फिल्म अमर अकबर एंथोनी के एक दृश्य में तीनों मजहब के नायक रक्तदान करते हैं जिसमें रक्तदान की नली एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और रक्त उनकी उनकी उस महिला को सीधे चढ़ाया जा रहा है जिसमें तीनो इस बात से महरूम है कि ये महिला उनकी मां है। यह करतब आजतक चिकित्सा विज्ञान में संभव नहीं हो पाया है। इस दृश्य को लेकर अमिताभ बच्चन ने निर्देशक मनमोहन देसाई के सामने आपत्ति रखी कि यह हास्यापद है जिसे दर्शक स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि तीन रक्तदाताओं और रक्त गृहिता को सीधे रक्त नहीं दिया जाता है। जिस पर श्री देसाई ने कहा कि फिल्म में यह दृश्य जरूर रहेगा और सुपरहिट होगा, और रहा भी। हम उस समय बेतुके दृश्य की तकनीकी कमी को नजरअंदाज करते हुए ताली पीटते रहे क्योंकि उस दौर में मनोरंजन पर जातिवाद की परत नहीं चढ़ पाई थी। गोया की समझदारी इंसान तो बनाती है पर इसकी अधिकता कभी कभी इंसानियत छीन लेती है। अब्दुल पंचर वाला हो या सुरेश हम्माल इनको कभी इस्लाम या हिन्दूत्व खतरे में नजर नहीं आया जो पढ़ लिख गए वो भयभीत हैं और असुरक्षा की भावना उन्हें नाहक ही घेर रही है। इस देश को अनपढ़ों ने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। तथाकथित पढ़े-लिखे लोग मजहब की अजीब-अजीब व्याख्या कर रहें हैं। घातक और फिजूल है ऐसा दानिशवर बनना.....

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