विपत्ति की मित्रता जीवन पर्यन्त धन की मित्रता क्षणिक होती है: संत राघवदास जी महाराज
बैतूल। मित्र हों तो श्रीकृष्ण जैसे, जो एक दीन ब्राह्मण सुदामा से भी मित्रता निभाते हैं। संसारियों की तरह नहीं कि थोड़ी सी भी पद प्रतिष्ठा पाकर ही अपने पुराने मित्र को हीन भावना से देखने लगते हैं। भगवान श्री कृष्ण, दीनबंधु हैं, करुणा सिंधु हैं। विपत्ति की मित्रता जीवन पर्यन्त चलती है जबकि धन के कारण हुई मित्रता क्षणिक होती है। भगवान कृष्ण ने अपने बचपन के मित्र सुदामा की गरीबी को देखकर रोते हुए अपने राज सिंहासन पर बैठाया और उन्हें उलाहना दिया कि जब गरीबी में रह रहे थे तो अपने मित्र के पास तो आ सकते थे। लेकिन सुदामा ने मित्रता को सर्वोपरि मानते हुए श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा। उन्होंने बताया कि सुदामा चरित्र हमें जीवन में आई कठिनाईयों का सामना करने की सीख देता है। सुदामा ने भगवान के पास होते हुए अपने लिए कुछ नहीं मांगा। कृष्ण-सुदामा की मित्रता उदाहरण है कि निस्वार्थ समर्पण ही असली मित्रता है। उक्त उद्गार सुभद्रा अस्पताल के पास, महावीर वार्ड में चल रही श्रीमद भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान संत राघवदास जी महाराज (अयोध्या) ने व्यक्त किए। उन्होने कहा कि सत्संग यानी सत्य के साथ, अनश्वर के साथ, ईश्वर के साथ लग जाना। साथ का मतलब है उसी भाव में, अवस्था में, मानसिकता में ठहर जाना। जो मनुष्य तुम्हें सत्य के साथ कर दे वह संत। जो जगह तुम्हें सत्य के निकट पहुंचा दे वह सत्संग-स्थल। जो किताब तुम्हें सत्य की अनुभूति के लिए प्रेरित करे वही वेद, वही उपनिषद वही पुराण है। यजमान विजय सिंह चौहान व श्रीमती राजकुमारी चौहान ने बताया कि आज गुरूवार यज्ञ व भंडारा प्रसादी के साथ कथा को विराम दिया जाएगा। आयोजक डॉ.विनय सिंह चौहान, चंदन सिंह चौहान व पहलवान सिंह चौहान ने उपस्थित होने का आग्रह किया है।


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